अनंत का सुर
पंडित शून्यसुर पाटिल
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
About
यह रचना तानपुरा की गूँजती हुई आधार ध्वनि के साथ शुरू होती है, जो धीरे-धीरे आलाप और जोर के माध्यम से एक गहन आध्यात्मिक यात्रा में बदल जाती है। तबले की जटिल ताल चक्र और सितार की सूक्ष्म मींडें इस राग-आधारित संगीत को एक दिव्य और शांत अनुभव प्रदान करती हैं।
Lyrics
शून्य में खोई हुई एक सांस,जैसे नभ में बिखरी कोई प्यास।अंधियारे में जलता एक दीया,पलकों पर ठहरा हुआ साया।आवाज़ मेरी, मुझ तक ही सिमट रही,जैसे कोई नदी, सागर को ढूँढ रही।
धड़कन की लय में, एक ताल पिरोई है,मेरी रूह आज, खुद में ही सोई है।न कोई मंज़िल, न कोई ठिकाना,बस एक सुर में, खुद को मिटाना।समय की धारा, ठहर सी गई है,मेरी ख़ामोशी, अब कह सी गई है।
तारों की झंकार में, उथल-पुथल है,बूंदों की बौछार में, एक हलचल है।तेज़ होती धड़कन, अब थमने न पाए,हर एक कतरा, नूर सा खिल जाए।सांसों का वेग, अब गगन चूमता है,मेरा वजूद, इस धुन में घूमता है।
सा रे गा मा, सुरों का ये कारवां,ढूँढता फिरता है, अपना ही आशिया।पा धा नी सा, ये सफर है निराला,मिट गया हर एक, भ्रम का प्याला।सा रे गा मा, सुरों का ये कारवां,ढूँढता फिरता है, अपना ही आशिया।पा धा नी सा, ये सफर है निराला,मिट गया हर एक, भ्रम का प्याला।भीतर की आग, अब शीतल हुई है,आत्मा की कलियाँ, अब जागी हुई हैं।न कोई दूरी, न कोई बिछड़ना,बस इस राग में, अब है संवरना।सा रे गा मा, सुरों का ये कारवां,ढूँढता फिरता है, अपना ही आशिया।पा धा नी सा, ये सफर है निराला,मिट गया हर एक, भ्रम का प्याला।ओ ओ ओ, सुर ही सत्य है,ओ ओ ओ, सुर ही नित्य है।सब कुछ यहीं है, सब कुछ यहीं है,मैं भी यहीं हूँ, तू भी यहीं है।सा रे गा मा, पा धा नी सा,सा नी धा पा, मा गा रे सा।अनंत की गोद में, अब ठिकाना है,इसी सुर में मुझे, अब खो जाना है।
अनंत का सुर
पंडित शून्यसुर पाटिल
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