शून्य का राग
आर्यनंद शास्त्री
हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत
About
यह रचना तानपुरा के निरंतर गूंजते हुए ड्रोन और सितार की सूक्ष्म मींड के साथ शुरू होती है, जो धीरे-धीरे आलाप से तालबद्ध गत की ओर बढ़ती है। इसमें राग-आधारित माधुर्य और जटिल ताल चक्र का समावेश है, जो एक आध्यात्मिक और ध्यानमग्न वातावरण का निर्माण करता है।
Lyrics
शून्य में खोई हुई एक सांस,जैसे थम गई हो वक्त की प्यास।अंधेरे के सीने में छिपी एक लौ,मौन है सब, बस तू ही तू कहो।न कोई दिशा, न कोई किनारा,मैं हूँ बूँद और तू ही सहारा।
धीरे-धीरे जागती है ये रूह,जैसे बादलों से निकलती हो धूप।हर धड़कन में एक नई लय है,जो तेरी ही रज़ा की विजय है।संसार के कोलाहल से दूर,तेरी यादों में हुआ मैं चूर।तारों की तरह बिखरता है मन,तुझसे ही शुरू, तुझपे ही खत्म।
सांसों की माला पे तेरा नाम पिरोया,मैंने खुद को तुझमें ही खोया।पलकों के नीचे जो सपने पले हैं,वे तेरे ही चरणों में आकर ढले हैं।ठहर जा ओ समय, ज़रा थम जा तू,मेरे भीतर का सन्नाटा है तू।नैनों के दर्पण में तेरी परछाईं,मुझको मेरी रूह से तूने मिलाई।
वेग बढ़ा, अब तो होश नहीं,तुझसे जुदा होने का दोष नहीं।अग्नि सी धधके है प्रीत की धारा,मिट गया मैं, अब तू ही तू सारा।झंकार उठी हर एक नस में,खो गया अस्तित्व मेरे बस में।अनंत का ये सफर, ये बेताबी,मेरी रूह की अब तू ही है चाबी।
सांसों की माला पे तेरा नाम पिरोया,मैंने खुद को तुझमें ही खोया।पलकों के नीचे जो सपने पले हैं,वे तेरे ही चरणों में आकर ढले हैं।ठहर जा ओ समय, ज़रा थम जा तू,मेरे भीतर का सन्नाटा है तू।नैनों के दर्पण में तेरी परछाईं,मुझको मेरी रूह से तूने मिलाई।
मिट गई दूरी, मिट गया है भेद,कट गए मेरे सब पुराने खेद।तू ही प्रकाश, तू ही है छाया,मैंने सब कुछ तुझमें ही पाया।अनंत में विलीन, शून्य का ये गान,मुझमें बसता है तेरा ही जहान।पूर्ण हुआ ये मिलन का सफर,तू ही है मंज़िल, तू ही है डगर।
शून्य का राग
आर्यनंद शास्त्री
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